अरावली का संकट: एक खामोश पर्यावरणीय आपदा

दुनिया की सबसे पुरानी भूवैज्ञानिक संरचनाओं में से एक अरावली पर्वत श्रृंखला आज एक अभूतपूर्व पर्यावरणीय संकट का सामना कर रही है। गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली यह पर्वतमाला सदियों से मरुस्थलीकरण और चरम जलवायु परिस्थितियों के विरुद्ध एक प्राकृतिक ढाल रही है। लेकिन अंधाधुंध खनन, वनों की कटाई और अनियंत्रित शहरी विस्तार ने इस पारिस्थितिक तंत्र को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया है।

विकास के नाम पर पहाड़ियों को समतल किया जा रहा है, प्राकृतिक जल निकासी प्रणालियां नष्ट की जा रही हैं और जंगल तेजी से गायब हो रहे हैं। इसका प्रभाव केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर जलवायु आपदाओं को जन्म दे रहा है। अरावली तापमान संतुलन, वर्षा पैटर्न और भूजल पुनर्भरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके क्षरण के कारण उत्तर भारत में लू की तीव्रता बढ़ी है, दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण गंभीर हुआ है और रेगिस्तानी परिस्थितियां पूर्व की ओर फैल रही हैं।

गुरुग्राम और फरीदाबाद जैसे शहरों में बढ़ता जल संकट इन प्राकृतिक रिचार्ज क्षेत्रों के नष्ट होने का प्रत्यक्ष परिणाम है। अल्पकालिक आर्थिक लाभ के लिए किया गया खनन और निर्माण दीर्घकालिक जोखिम पैदा कर रहा है—बाढ़, सूखा, जैव विविधता का नुकसान और जलवायु अस्थिरता। विडंबना यह है कि क्षतिग्रस्त पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली की लागत, उसके दोहन से मिले लाभों से कहीं अधिक है।

हालांकि न्यायालयों के आदेश और संरक्षण नीतियां मौजूद हैं, लेकिन कमजोर क्रियान्वयन इन्हें निष्प्रभावी बना रहा है। अरावली संकट को केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि धीमी गति से आने वाली आपदा के रूप में देखने की आवश्यकता है, ताकि प्रतिक्रिया से पहले रोकथाम पर ध्यान केंद्रित किया जा सके।

समाधान: गुणवत्ता-आधारित कदम

  • अवैध खनन पर सख़्त रोक: सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का कड़ाई से पालन, ड्रोन और सैटेलाइट निगरानी
  • वन संरक्षण व पुनर्वनीकरण: स्थानीय प्रजातियों के वृक्षों से क्षतिग्रस्त क्षेत्रों का पुनर्जीवन।
  • संतुलित विकास नीति: पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) के बिना किसी भी परियोजना को अनुमति न मिले।
  • जल संरक्षण उपाय: वर्षा जल संचयन, पारंपरिक जल संरचनाओं का पुनरुद्धार।
  • स्थानीय समुदाय की भागीदारी: ग्रामीण व आदिवासी समाज को संरक्षण योजनाओं से जोड़ना।