नेताओं की जुबां पर नारे, जनता के सवाल बेचारे

प्रदेश की जनता अब किससे उम्मीद करे


सरकार विपक्ष के खिलाफ, विपक्ष सरकार के खिलाफ नारेबाजी में व्यस्त; दो दिन से विधानसभा की कार्रवाई हंगामे की भेंट

हिमाचल विधानसभा का मानसून सत्र इन दिनों जनहित की आवाज का मंच कम और सत्ता-विपक्ष की नारेबाजी का अखाड़ा ज्यादा नजर आ रहा है। दो दिन बीत गए, सदन में हंगामा जारी है और प्रदेश की जनता बाहर खड़ी होकर शायद यही सोच रही है—जिस विधानसभा में उसके सवालों के जवाब मिलने थे, वहां फिलहाल नेताओं की आवाज ही एक-दूसरे को सुनाई नहीं दे रही।
एक तरफ सरकार विपक्ष के खिलाफ नारे लगा रही है, दूसरी तरफ विपक्ष सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए है। लोकतंत्र के मंदिर में बहस होनी थी, लेकिन माहौल ऐसा बन गया है मानो जिसकी आवाज सबसे ऊंची, वही लोकतंत्र का सबसे बड़ा पहरेदार!

भाजपा सरकार पर राष्ट्रगीत के अपमान का आरोप लगा रही है तो कांग्रेस भाजपा पर राष्ट्रगान के अपमान का। यानी आरोप दोनों तरफ, नारे दोनों तरफ और राजनीति भी दोनों तरफ—बस जनता के मुद्दे दोनों तरफ से गायब!
विधानसभा के पहले दिन
मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू अपनी कैबिनेट के साथ विधानसभा परिसर के बाहर राष्ट्रगान के अपमान को लेकर
भाजपा के खिलाफ नारे लगाते नजर आए। दूसरी तरफ भाजपा भी कथित राष्ट्रगीत अपमान को लेकर प्रदर्शन कर रही है। ऐसे में विधानसभा के भीतर कानून, नीति और प्रदेश के विकास पर चर्चा की जगह बाहर शक्ति प्रदर्शन का सियासी मुकाबला दिखाई दे रहा है।

उधर प्रदेश में बेरोजगार नौकरी की राह देख रहा है, महंगाई जेब पर भारी है, सड़कें जवाब मांग रही हैं, पानी की समस्या कई जगह मुंह बाए खड़ी है, अस्पतालों में सुविधाओं की जरूरत है और शिक्षा व्यवस्था भी सवालों से अछूती नहीं। कर्मचारी अपने मुद्दे लेकर खड़े हैं और आम आदमी अपने रोजमर्रा के संघर्ष में उलझा है।
लेकिन विधानसभा में फिलहाल जनता के सवालों पर चर्चा से ज्यादा यह तय होता दिखाई दे रहा है कि किसका नारा ज्यादा जोर से गूंजा।