आपातकाल संविधान की हत्या थी, कांग्रेस और इंदिरा गांधी इसके जिम्मेदार हैं : जयराम ठाकुर

पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने शिमला से जारी बयान में कहा कि 25 जून 1975 को देश में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा अपनी कुर्सी बचाने के लिए थोपा गया आपातकाल लोकतंत्र का काला अध्याय है। यह भारत के संविधान की हत्या थी। दुनिया भर में किसी भी लोकतांत्रिक सरकार द्वारा अतीत में ऐसा कदम शायद ही कभी उठाया गया हो। यह एक व्यक्ति, उसकी महत्वाकांक्षाओं और उसके स्वयं को देश के संविधान से बड़ा समझने की मानसिकता का परिणाम था।
उन्होंने कहा कि अपने विरोधी नेताओं को अकारण जेलों में ठूंस देना और उन्हें यातनाएं देना आपातकाल की आम घटनाएं थीं। यह आपातकाल कांग्रेस की “इंडिया इज़ इंदिरा और इंदिरा इज़ इंडिया” जैसी कुत्सित मानसिकता की उपज था, जहां तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने “Constitution of India” को “Constitution of Indira” समझ लिया था। देश को अपनी संपत्ति समझने का यह भाव आज भी कांग्रेस की सोच से पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।


जयराम ठाकुर ने कहा कि हास्यास्पद बात यह है कि लोकतंत्र की हत्या करने और संविधान का गला घोंटने वाले नेताओं के वंशज आज “संविधान बचाओ यात्रा” निकाल रहे हैं। संविधान की आत्मा कही जाने वाली उसकी उद्देशिका (Preamble) में बदलाव करने वाले नेताओं के वंशज दूसरों पर संविधान के साथ छेड़छाड़ का आरोप लगा रहे हैं। उन्हें अपने गिरेबान में झांकना चाहिए और देश से माफी मांगनी चाहिए।


नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि जिस प्रकार इंदिरा गांधी ने चुनाव रोककर और आपातकाल लगाकर देशवासियों के संवैधानिक अधिकारों को छीना था, उसी प्रकार हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने भी पंचायत चुनाव रोककर एक तरह का अघोषित आपातकाल लागू कर दिया है। उनकी सरकार चुने हुए जनप्रतिनिधियों को डराने, धमकाने और प्रताड़ित करने का काम कर रही है, ताकि अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनावों में उनके पक्ष में मतदान सुनिश्चित किया जा सके।


जयराम ठाकुर ने कहा कि दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि कांग्रेस आज भी आपातकाल को गलत नहीं मानती। इसी कारण सुक्खू सरकार सत्ता में आते ही विधानसभा में पहला विधेयक हमारी सरकार द्वारा शुरू की गई लोकतंत्र प्रहरी सम्मान राशि को बंद करने के लिए लेकर आई। लोकतंत्र प्रहरी सम्मान राशि भाजपा सरकार द्वारा उन लोकतंत्र सेनानियों के लिए शुरू की गई थी, जिन्होंने आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की रक्षा के लिए जेल की यातनाएं झेली थीं।